मुझे गम नहीँ जो नींद ना मयस्सर हो
मेरे मौला मुझे ख्वाबों से रिहा कर दे
हक़ीक़त और तसवउर के दरमीयाँ घुटन सी है
जिसे पाने की हसरत हो उसे नज़र से निहान कर दे
इतना कंज़रफ़ ओ मगरूर हूँ की कह नही सकता
मुझे आगोश मे भर ज़िंदगी की ईशा कर दे
तेरी कायनात में पाने खोने का दस्तूर है
मुट्ठी में बंद तक़दीर को मेरी , हवा कर दे
जो कह ना सका यक़ीनन तू समझ जाएगा
मेरी इल्टीजा मान अपना फरमान बयान कर दे
हर गुज़रता लम्हा मेरे होश ले रहा है
ठहरे हुए एहसास हैं उन्हे रवान कर दे
Wednesday, January 02, 2008
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