अब तो उतनी भी नही मिलती है मैखने में,
जितना वो छोड़ दिया करते थे पैमाने में !!
अब ख़ुद ही समझ लो मेरी नज़रो का फ़सना !
लब्ज़ो से तो इज़हार मुक्कमल नही होता !!
दीदार की तम्मना है तो नज़ारे जमाए रख,
आँचल हो या नक़ाब सरकता ज़रूर है !
इस ख़ुशबू को महकने से ना रोक,
इस उमर में ये गुलाब मेहकता ज़रूर है !!
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