तेरे चेहरे को छूने की चाहत नहीं,
बंद मुट्ठी में खुले गम की कोई आहट नहीं ,
रात के ख्वाबों में शायद बिचादा था मुझसे,
सुबह की नींद किसी ख़ुशी की सजावट नहीं,
दर्द इतना अपना होकर मिलता है मुझसे,
मौत से भी अब होती मुझे घबराहट नहीं,
उसके प्यार में जलजलकर खरा सोना बनी हूँ,
वर्ना आग में जलने की मुझे आदत नहीं,
मोहब्बत जुनू बन गई है इबादात करते करते,
वो तो मेरे प्रेम की लगन से वाकिफ नहीं.
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