वक्त बीता याद आता
बीत जाती जो कहानी जग उसे ही दोहराता
युवापन का मीत जिसने घाव उर पर था लगाया
आज वो सपने में आकर कामना की लौ जलाता
पोटली जिसके खतों की कल जलाई आज उसकी
बेवफाई की अदा पर बेतहाशा प्यार आता
जो मिला अपना पराया जोड सबसे आये नाता
बालमन मिट्टी की गुड़िया माँगता था मिल न पायी
जब मिली तो कामनाएँ बाढ़ बरसाने लगी थीं
रंग ले यौवन का बरसाने पहुँच मैं भी गया पर
गोपियाँ नवरात्रि के तब तक भजन गाने लगी थीं
बस गया भीतर वही बाहर हमें जो मिल न पाता
पाँव जितने पग चले पदचिह्न भी उतने बनाये
और हर पग पर डगर से भी मिली सौगात कोई
चाहतें किलकारियाँ खुशियाँ भले कुछ कम मिलीं पर
अनगिनत छाले गठानें दाग तिल काँटे बिवाई
जिन्दगी से जो मिला सुख-दुख हमें सब आज भाता
***
--सुधीर साहु
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